🪷 ŚB 11.2.40
Sanskrit, transliteration, word meanings, and translation for steady Bhāgavata reading.
Sanskrit
Transliteration
Synonyms
Translation
By chanting the holy name of the Supreme Lord, one comes to the stage of love of Godhead. Then the devotee is fixed in his vow as an eternal servant of the Lord, and he gradually becomes very much attached to a particular name and form of the Supreme Personality of Godhead. As his heart melts with ecstatic love, he laughs very loudly or cries or shouts. Sometimes he sings and dances like a madman, for he is indifferent to public opinion.
गीता प्रेस, गोरखपुर · पृथक पाठ-साक्षी
Sanskrit and Hindi Witness
इस पाठ-साक्षी का श्लोक-पता वर्तमान ŚB मार्ग से ठीक मिलता है। गीता प्रेस और वर्तमान अंग्रेज़ी पाठ को मिलाया नहीं गया है; दोनों अपने-अपने स्रोत-रूप में साथ पढ़े जा सकते हैं।
ŚB 11.2.40 · गीता प्रेस पाठ
हिन्दी भावार्थ
ईश्वरसे विमुख पुरुषको उनकी मायासे अपने स्वरूपकी विस्मृति हो जाती है और इस विस्मृतिसे ही ‘मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ,’ इस प्रकारका भ्रम—विपर्यय हो जाता है। इस देह आदि अन्य वस्तुमें अभिनिवेश, तन्मयता होनेके कारण ही बुढ़ापा, मृत्यु, रोग आदि अनेकों भय होते हैं। इसलिये अपने गुरुको ही आराध्यदेव परम प्रियतम मानकर अनन्य भक्तिके द्वारा उस ईश्वरका भजन करना चाहिये॥ ३७॥ राजन्! सच पूछो तो भगवान्के अतिरिक्त, आत्माके अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं। परन्तु न होनेपर भी इसकी प्रतीति इसका चिन्तन करनेवालेको उसके चिन्तनके कारण, उधर मन लगनेके कारण ही होती है—जैसे स्वप्नके समय स्वप्नद्रष्टाकी कल्पनासे अथवा जाग्रत् अवस्थामें नाना प्रकारके मनोरथोंसे एक विलक्षण ही सृष्टि दीखने लगती है। इसलिये विचारवान् पुरुषको चाहिये कि सांसारिक कर्मोंके सम्बन्धमें संकल्प-विकल्प करनेवाले मनको रोक दे—कैद कर ले। बस, ऐसा करते ही उसे अभय पदकी, परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी॥ ३८॥ संसारमें भगवान्के जन्मकी और लीलाकी बहुत-सी मंगलमयी कथाएँ प्रसिद्ध हैं। उनको सुनते रहना चाहिये। उन गुणों और लीलाओंका स्मरण दिलानेवाले भगवान्के बहुत-से नाम भी प्रसिद्ध हैं। लाज-संकोच छोड़कर उनका गान करते रहना चाहिये। इस प्रकार किसी भी व्यक्ति, वस्तु और स्थानमें आसक्ति न करके विचरण करते रहना चाहिये॥ ३९॥ जो इस प्रकार विशुद्ध व्रत—नियम ले लेता है, उसके हृदयमें अपने परम प्रियतम प्रभुके नाम-कीर्तनसे अनुरागका, प्रेमका अंकुर उग आता है। उसका चित्त द्रवित हो जाता है। अब वह साधारण लोगोंकी स्थितिसे ऊपर उठ जाता है। लोगोंकी मान्यताओं, धारणाओंसे परे हो जाता है। दम्भसे नहीं, स्वभावसे ही मतवाला-सा होकर कभी खिलखिलाकर हँसने लगता है तो कभी फूट-फूटकर रोने लगता है। कभी ऊँचे स्वरसे भगवान्को पुकारने लगता है, तो कभी मधुर स्वरसे उनके गुणोंका गान करने लगता है। कभी-कभी जब वह अपने प्रियतमको अपने नेत्रोंके सामने अनुभव करता है, तब उन्हें रिझानेके लिये नृत्य भी करने लगता है॥ ४०॥
स्रोत-खंड सीमा · यह हिन्दी अंश गीता प्रेस डिजिटल पाठ में इस दृश्य श्लोक-इकाई के बाद आता है; इसे स्वतः एक-से-एक टीका या संस्करण-समानता नहीं माना गया है।
Source witness details
Sanskrit SHA-256:
b8c59a3695ee083f5f30f804e8b98ae6ad4515245be2249f489170f81d978695Hindi SHA-256:
d8beabf135d0a9c16d9dd1d0c6ef8a5a64f20b94a96f39ee03963a68f090994cAddress crosswalk: exact · final textual equivalence: not claimed
Sources and Connected Bhāgavata Readings
After the Sanskrit, word meanings, translation, and reading navigation, these links connect the requested reference with its canonical received passage, parent chapter and skandha, and the wider Bhāgavata corpus without inventing artificial verse boundaries.
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