🪷 Bhagavad-Gītā · 18.59

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग · Mokṣa-Sannyāsa-Yoga · "The Yoga of Liberation & Renunciation" · Verse 59 of 78

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।18.59।।
Bhagavad-Gītā 18.59 · Devanāgarī root text

🪷 English Translations

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Shri Purohit Swami · Poetic English · 1935 edition attribution in the received data
18.59 If thou in thy vanity thinkest of avoiding this fight, thy will shall not be fulfilled, for Nature herself will compel thee.
Swami Sivananda · Direct prose · Divine Life Society
18.59 If, filled with egoism, thou thinkest: "I will not fight", vain is this, thy resolve; Nature will compel thee.
Swami Gambīrānanda · Word-key glosses · Advaita Ashrama · Śaṅkara-school
18.59 Yat, that; manyase, you think, resolve; this-'na yotsye, I shall not fight'; asritya, by relying; on ahankaram, egotism, mithya, vain; is esah, this; vyava-sayah, determination; te, of yours; because prakrtih, nature, your own nature of a Ksatriya; niyoksyati, will impell; ;tvam, you!
Swami Ādidevānanda · Śrī-Vaiṣṇava perspective · Rāmānuja school
18.59 If, in your 'self-conceit,' i.e., under a false sense of independence that you know what is good for you and what is not - if, not heeding My ?nd, you think, 'I will not fight,' then this resolve based on your sense of independence will be in vain. For Nature will compel you to go against your resolve - you who are ignorant and who adversely react to my sovereignty. He elucidates the same:
Dr. S. Sankaranarayan · Academic precision · modern scholarly
18.59. In case, holding fast to the sense of ego, you think (decide) 'I shall not fight', that resolve of yours will be just useless. [For] your own natural condition will incite you [to fight].

🪷 Hindi Translation · हिन्दी अनुवाद

Received Hindi rendering attributed in the source data to Swami Rāmsukhdās ji.

🪷 Swami Rāmsukhdās · Hindi rendering · source-data attribution
।।18.59।।अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी।

🪷 English Commentaries · The Ācārya Voices

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Swami Sivananda · Verse-by-verse word-keys with Sanskrit anchors
18.59 यत् if? अहङ्कारम् egoism? आश्रित्य having taken refuge in? न not? योत्स्ये (I) will fight? इति thus? मन्यसे (thou) thinkest? मिथ्या vain? एषः this? व्यवसायः resolve? ते thy? प्रकृतिः nature? त्वाम् thee? नियोक्ष्यति will compel.Commentary This strong determination of thy mind will be rendered utterly futile by thy inner nature thy nature will constrain thee thy nature as a warrior will compel thee to fight. It is a mere illusion to say that thou art Arjuna? that these are thy relatives and that to kill them will be a sin.
Swami Gambīrānanda · Advaita-school commentary (Śaṅkara tradition)
18.59 Yat, that; manyase, you think, resolve; this-'na yotsye, I shall not fight'; asritya, by relying; on ahankaram, egotism, mithya, vain; is esah, this; vyava-sayah, determination; te, of yours; because prakrtih, nature, your own nature of a Ksatriya; niyoksyati, will impell; ;tvam, you!
Swami Ādidevānanda · Rāmānuja Śrī-Vaiṣṇava commentary
18.59 If, in your 'self-conceit,' i.e., under a false sense of independence that you know what is good for you and what is not - if, not heeding My ?nd, you think, 'I will not fight,' then this resolve based on your sense of independence will be in vain. For Nature will compel you to go against your resolve - you who are ignorant and who adversely react to my sovereignty. He elucidates the same:
Dr. S. Sankaranarayan · Modern academic scholarship
18.59 See Comment under 18.60
Swami Chinmayānanda · Chinmaya Mission · modern Vedantic teaching
।।18.59।। सत्य के सामान्य कथन की ओर मनुष्य विशेष ध्यान नहीं देता। इस कारण सत्य के उस ज्ञान को वह आत्मसात् नहीं कर पाता। परन्तु यदि उसी सामान्य कथन को मनुष्य को अपने जीवन से सम्बन्धित अनुभवों में प्रयुक्त कर दर्शाया जाये? तो वह उस ज्ञान को अर्जित कर आत्मसात् कर लेता है। वह ज्ञान उसका अपना नित्य अनुभव बन जाता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण पूर्वोक्त दार्शनिक सिद्धांत को अर्जुन की तात्कालिक समस्या के सन्दर्भ में उसे समझाना चाहते हैं।यदि अपने अभिमान के कारण अर्जुन यह सोचता है कि वह युद्ध नहीं करेगा? तो उसका यह निश्चय व्यर्थ है उसका क्षत्रिय स्वभाव व्यक्त होने के लिए सदैव अवसर की प्रतीक्षा करता रहेगा? और उपयुक्त अवसर पाकर वह अर्जुन को कर्म करने को बाध्य किये बिना नहीं रहेगा। प्रकृति तुम्हें प्रवृत्त करेगी। जिसने लवण भक्षण किया है? उसे शीघ्र ही प्यास लगेगी। युद्ध से निवृत्त होने में अर्जुन जो मिथ्या तर्क प्रस्तुत करता है? वह वस्तुत प्राप्त परिस्थितियों के साथ उसके द्वारा किये गये समझौते को ही दर्शाता है।यदि अर्जुन तत्कालीन अस्थायी वैराग्य अथवा पलायन की भावना के कारण युद्ध से विरत हो जाता है? तो भी प्राकृतिक नियमामुसार? कालान्तर में उसका स्वभाव ही उसे कर्म करने के लिए बाध्य करेगा और उस समय संभव है कि उसे अपने स्वभाव को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त क्षेत्र न मिले? जिससे वह अपनी वासनाओं का क्षय कर सके।

🪷 Hindi Vyākhyā · हिन्दी व्याख्या

Received Hindi vyākhyā attributed in the source data to Swami Rāmsukhdās ji.

🪷 Swami Rāmsukhdās · Hindi vyākhyā · source-data attribution
।।18.59।। व्याख्या -- यदहंकारमाश्रित्य -- प्रकृतिसे ही महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है -- मैं शरीर हूँ। इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है? बदलनेवाली है? इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता 3। 5)।जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है? तो फिर वह यह कैसे रह सकता है कि मैं अमक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना -- इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता? उससे निर्लिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है)? तो फिर उसके लिये करना और न करना -- ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे? ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है? उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।न योत्स्य इति मन्यसे -- दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की -- शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) और उसके बाद अर्जुनने साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- न योत्स्ये (2। 9)। यह बात भगवानको अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी तरफसे साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी कारण कि वास्तविक शरणागत होनेपर मैं यह करूँगा? यह नहीं करूँगा ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागत होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे? वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (2। 10)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया? नहीं तो भगवान् वहींपर यह कह देते कि जैसा चाहता है? वैसा कर -- यथेच्छसि तथा कुरु (18। 63) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि मैं युद्ध नहीं करूँगा भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों -- न योत्स्ये का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है? मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो युद्ध नहीं करूँगा ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागत होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता 7। 14)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है? जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता 7। 13) क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं? उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं? पर हो जाते हैं उनके गुलाम परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते? उन पदार्थोंके परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थों और क्रियाओँको अपनी मान्यता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है? और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती -- यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं? वे मौतके मार्ग(संसार)में बह जाते हैं -- निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि (9। 3)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो तेरा यह कहना? तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्रप्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।मिथ्यैष व्यवसायस्ते -- व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है -- वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है? उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है? उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती है? और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है? उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? ऐसा तेरा (क्षात्रप्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है? झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये? प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है? तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है? नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि,मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति -- इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है -- शूरवीरता? युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता 18। 43)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी? अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।

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APA: Vyāsa Maharṣi. (n.d.). Bhagavad-Gītā 18.59. Vidhyāmitra. Retrieved 2026-08-17, from https://vidhyamitra.com/bhagavad-gita/18/59
Chicago: Vyāsa Maharṣi. "Bhagavad-Gītā 18.59." Vidhyāmitra. Accessed 2026-08-17. https://vidhyamitra.com/bhagavad-gita/18/59.
MLA: Vyāsa Maharṣi. "Bhagavad-Gītā 18.59." Vidhyāmitra, 2026, https://vidhyamitra.com/bhagavad-gita/18/59.
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🪷 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🪷

सर्वम् कृष्णार्पणम् — this verse is one maṇi (jewel) on Krishna's thread (BG 7.7)