🪷 Rāmcharitamānas · Laṅkā-Kāṇḍa · Entry 145

The Book of Laṅkā (the Yuddha) · Entry 145 of 273 · type: चौपाई

सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।। बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ।। सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा।। तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा।। सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा।। परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर।। तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना।। सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं।। करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए।। गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए।। बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।।
— Rāmcharitamānas Laṅkā-Kāṇḍa entry 145 (चौपाई) · Goswāmi Tulsidās · Awadhi-Hindi Devanāgarī

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